Masterpiece of the Week

Drishti

by kamal kshatri
Inspired by: "Express Yourself"
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दृष्टि

 सुनीता विलियम से किसी ने पूछा,

कि अंतरिक्ष से दुनिया कैसी दिखती है?

उत्तर

उनका तो सरल शब्दों में था, पर यहाँ मैं भाव प्रकट कर रहा हूँ।

कि,

ऊपर से देख अपने ही ग्रह को

मन में एक एहसास जगा,

छोटा सा नीला बिंदु,

हम सब रहते साथ जहाँ।1।

एक पानी है, एक आकाश,

एक हवा, एक ज़मीन वहाँ।

क्यों लड़ते हैं, पता नहीं,

क्यों पनपा ये फ़साद कहाँ।

कितना अजीब लगता है मानो,

किस बात पे बहस चला।2।


**अब मेरी नज़र में…**

होते जब इंसान घरों में

बर्तनों से टकराते हैं,

न जाने क्यों भरे हुए

बेमतलब शोर मचाते हैं।3।

गली में जाकर लड़ते औरों से,

शेख़ी खूब जताते,

न जाने क्या पा लिया

खुद को ईश्वर ही बताते।4।

शहर में जाकर रौब झाड़ते,

“गली-फलाँ तो मेरा है”,

शहर दूर जाकर फिर

खुद को शहरीपन से घेरा है।5।

दूर राज्य जब पहुँच गया,

तब होश नहीं क्या गाँव-शहर,

बह जाता फिर देशभक्ति में,

एक झंडे की देख लहर।6।

देश-विदेश घूम-घूम कर

अपने को देसी कहना,

क्या सोच बस इतनी-सी है

बंद कुएँ में ही रहना।7।

विज्ञान के क़दमों ने जब

मंगल तक क़दम बढ़ाया,

सूरज से ऊपर भी

लाखों सूरज हैं — बताया।8।

सोच हमारी जितनी गहरी,

उससे कहीं ब्रह्मांड है,

कल्पना न कर सके यहाँ

जो एक विशाल ये जहान है।9।

सूक्ष्म जीव मानो अपने

इस धरती जहाँ हम रहते हैं,

न जाने हम धरतीवासी

कैसी अकड़ ये रखते हैं।10।

हम इंसान तो देख चुके हैं

क्या प्रकृति की ताक़त है,

मुड़कर देखें आदिकाल से

कैसी अपनी विरासत है।11।


प्रश्न करो अपने मन में —

ये खाई किसने बनाई?

क्यों फैलाया द्वेष दिलों में,

ये बात सिखाई?


शायद हमने अब भी

पशुवत जीना ही स्वीकारा,

पहले अपना पेट भरा,

फिर निकटता को पुचकारा।12।


लड़ना-भिड़ना एक विकृति,

मन की अब तक न चुप पाई,

है ज्ञान का सागर फिर भी

डुबकी नहीं लगाई।13।

खूब रचा सिद्धांत यहाँ है,

द्वैत कहीं, अद्वैत कहीं,

खूब बन चुके कुनबे सारे,

मानवता तो रही नहीं।14।

घर से निकले, शहर से होकर

पहुँचे आसमान में,

खोज लिया है सारा संसार —

क्या खोजा हमने इंसान में….....।15।



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